बरसठी से जौनपुर
हमारा जौनपुर बरसठी से जौनपुर _____________________ अगर आपको कभी संदेह हो की मानव उत्पत्ति बंदरो से नही हुई है तो एक बार मेरे गाँव सरसरा स्थित बरसठी स्टेशन आ जाइये । रोजाना मड़ियाहूं जौनपुर जाने वाले लड़के स्टेशन से लेकर ट्रैन में ऐसा उधम मचाते है जैसे की हनुमान जी लंका दहन पर निकले हो और कूद कूद कर अंटारिकाओ और परकोटे को जला रहे हो। क्षेत्र के लड़के जाते तो इलाहाबाद भी है लेकिन उनपर उम्मीदों का बोझ थोड़ा ज्यादा होता है इसलिए बोझ से दबे होने के कारण वो बन्दर से इंसान में परिवर्तित होने की प्रक्रिया में होते है इसलिए उनकी उछल कूद कम होती है। बीए बीएससी एमए एमएससी के बाद अब आईटीआई के छात्र रोजाना चढते है इलाहबाद जौनपुर पैसेंजर एजे(आओ झेलो) या इंटरसिटी ट्रैन पर। ट्रेन आने की जब आहट तक नही होती तब भी ये लड़के रेलवे पटरी पर कान रख कर तरंगों के माध्यम से ट्रेन की दूरी का अंदाजा लगाते है। जैसे की 'तरंगों की चाल ठोस में सबसे ज्यादा होती है' वाले टॉपिक को कुछ ज्यादा ही सीरियसली ले लिए हो। जब तक ट्रेन ना आ जाये तब तक हर कोई अपने छठी इंद्री से ट्रेन के सही लोकेशन की भविष्यवाणी करता ...