बरसठी से जौनपुर
हमारा जौनपुर
बरसठी से जौनपुर
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अगर आपको कभी संदेह हो की मानव उत्पत्ति बंदरो से नही हुई है तो एक बार मेरे गाँव सरसरा स्थित बरसठी स्टेशन आ जाइये । रोजाना मड़ियाहूं जौनपुर जाने वाले लड़के स्टेशन से लेकर ट्रैन में ऐसा उधम मचाते है जैसे की हनुमान जी लंका दहन पर निकले हो और कूद कूद कर अंटारिकाओ और परकोटे को जला रहे हो। क्षेत्र के लड़के जाते तो इलाहाबाद भी है लेकिन उनपर उम्मीदों का बोझ थोड़ा ज्यादा होता है इसलिए बोझ से दबे होने के कारण वो बन्दर से इंसान में परिवर्तित होने की प्रक्रिया में होते है इसलिए उनकी उछल कूद कम होती है। बीए बीएससी एमए एमएससी के बाद अब आईटीआई के छात्र रोजाना चढते है इलाहबाद जौनपुर पैसेंजर एजे(आओ झेलो) या इंटरसिटी ट्रैन पर। ट्रेन आने की जब आहट तक नही होती तब भी ये लड़के रेलवे पटरी पर कान रख कर तरंगों के माध्यम से ट्रेन की दूरी का अंदाजा लगाते है। जैसे की 'तरंगों की चाल ठोस में सबसे ज्यादा होती है' वाले टॉपिक को कुछ ज्यादा ही सीरियसली ले लिए हो। जब तक ट्रेन ना आ जाये तब तक हर कोई अपने छठी इंद्री से ट्रेन के सही लोकेशन की भविष्यवाणी करता रहता है। टिकेट की बात की जाए तो जौनपुर की तरफ जाने वाली ट्रेन में जौनपुर जंक्शन जाने वालों के अलावा शायद ही कोई टिकेट लेता हो क्योंकि मड़ियाहूं जाने वाले तो बस की बजाय ट्रैन से यात्रा कर वैसे ही रेल विभाग पर एहसान कर चुके होते है ।एहसान इसलिए की किराया न तो बस का देना है न ट्रैन का।
ट्रैन आकर प्लेटफॉर्म, जो की रेलवे पटरी से भी नीचे है, पर खड़ी होती है तो चढ़ने वालो में कोई छात्र नही होता। छात्र तब चढते है जब ट्रेन अपनी फुल स्पीड में होती है मानो थोड़ी कम स्पीड में चढ़ गए तो ओलम्पिक में पदक से चूक जाएंगे। ये लड़के सारे बृद्ध और भारी सामान वालो के सहायक होते है । उतारने चढाने में पूरी मदद करेंगे। अन्य जगहों के उत्पाती सीट पर जबरन कब्ज़ा करने जैसा कुकृत्य करते है लेकिन ये उत्पाती इस विकार से मुक्त होते है । इनका मनपसंद जगह किसी सुन्दर लड़की के सीट के अगल बगल खड़ा होकर अपना अपना हुनर दिखाना होता है या फिर गेट से लटकना। ट्रैन को बैलगाड़ी बना कर चलते है। अगर कोई लड़का स्टेशन पहुचने में देर हो रहा है तो उसे स्टेशन आने की कोई जरुरत नही , उसके साथी उसके घर से सबसे पास वाली जगह पर ट्रेन रोक ही देते है। ट्रैन रोकने का सबसे आसान तरीका जंजीर खीचना होता है लेकिन इन लड़को को उसमे मजा नही आता क्योंकि यह तो बच्चों का खेल है बैठे बैठे कोई भी रोक दे। उन्हें एडवेंचर पसंद है इसलिए जंजीर के बजाय वो लटक कर डिब्बे के बाहर कही लगे वॉल्व को खोलते है और ट्रेन रोकते है। एक बार लड़के का अंदाजा गलत निकला तो ट्रैन सुदनीपुर और सलखापुर के बीच सई नदी पर बने लगभग ट्रैन के लंबाई के बराबर पुल पर ट्रेन रुक गयी जहा से न तो कोई उतर सकता था और ना ही चढ़ सकता था...
जाते समय यात्रा हमेशा सुखद और उछल कूद के साथ होती है लेकिन शाम में लौटते समय यह सुबह जैसी नही होती है। शाम में इनकी वापसी अधिकांशतः हिंसक हो जाती है क्योंकि कॉलेज में कौन किसको रोब दिखाया इन सब का हिसाब ट्रैन में ही होता है..
और एक दूसरे पर तर्क-वितर्क करते करते सब अपने-अपने मंजिल पहुंच जाते है और फिर कहते है भईया राम-राम...फिर मिलेगें...
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अगर आपको कभी संदेह हो की मानव उत्पत्ति बंदरो से नही हुई है तो एक बार मेरे गाँव सरसरा स्थित बरसठी स्टेशन आ जाइये । रोजाना मड़ियाहूं जौनपुर जाने वाले लड़के स्टेशन से लेकर ट्रैन में ऐसा उधम मचाते है जैसे की हनुमान जी लंका दहन पर निकले हो और कूद कूद कर अंटारिकाओ और परकोटे को जला रहे हो। क्षेत्र के लड़के जाते तो इलाहाबाद भी है लेकिन उनपर उम्मीदों का बोझ थोड़ा ज्यादा होता है इसलिए बोझ से दबे होने के कारण वो बन्दर से इंसान में परिवर्तित होने की प्रक्रिया में होते है इसलिए उनकी उछल कूद कम होती है। बीए बीएससी एमए एमएससी के बाद अब आईटीआई के छात्र रोजाना चढते है इलाहबाद जौनपुर पैसेंजर एजे(आओ झेलो) या इंटरसिटी ट्रैन पर। ट्रेन आने की जब आहट तक नही होती तब भी ये लड़के रेलवे पटरी पर कान रख कर तरंगों के माध्यम से ट्रेन की दूरी का अंदाजा लगाते है। जैसे की 'तरंगों की चाल ठोस में सबसे ज्यादा होती है' वाले टॉपिक को कुछ ज्यादा ही सीरियसली ले लिए हो। जब तक ट्रेन ना आ जाये तब तक हर कोई अपने छठी इंद्री से ट्रेन के सही लोकेशन की भविष्यवाणी करता रहता है। टिकेट की बात की जाए तो जौनपुर की तरफ जाने वाली ट्रेन में जौनपुर जंक्शन जाने वालों के अलावा शायद ही कोई टिकेट लेता हो क्योंकि मड़ियाहूं जाने वाले तो बस की बजाय ट्रैन से यात्रा कर वैसे ही रेल विभाग पर एहसान कर चुके होते है ।एहसान इसलिए की किराया न तो बस का देना है न ट्रैन का।
ट्रैन आकर प्लेटफॉर्म, जो की रेलवे पटरी से भी नीचे है, पर खड़ी होती है तो चढ़ने वालो में कोई छात्र नही होता। छात्र तब चढते है जब ट्रेन अपनी फुल स्पीड में होती है मानो थोड़ी कम स्पीड में चढ़ गए तो ओलम्पिक में पदक से चूक जाएंगे। ये लड़के सारे बृद्ध और भारी सामान वालो के सहायक होते है । उतारने चढाने में पूरी मदद करेंगे। अन्य जगहों के उत्पाती सीट पर जबरन कब्ज़ा करने जैसा कुकृत्य करते है लेकिन ये उत्पाती इस विकार से मुक्त होते है । इनका मनपसंद जगह किसी सुन्दर लड़की के सीट के अगल बगल खड़ा होकर अपना अपना हुनर दिखाना होता है या फिर गेट से लटकना। ट्रैन को बैलगाड़ी बना कर चलते है। अगर कोई लड़का स्टेशन पहुचने में देर हो रहा है तो उसे स्टेशन आने की कोई जरुरत नही , उसके साथी उसके घर से सबसे पास वाली जगह पर ट्रेन रोक ही देते है। ट्रैन रोकने का सबसे आसान तरीका जंजीर खीचना होता है लेकिन इन लड़को को उसमे मजा नही आता क्योंकि यह तो बच्चों का खेल है बैठे बैठे कोई भी रोक दे। उन्हें एडवेंचर पसंद है इसलिए जंजीर के बजाय वो लटक कर डिब्बे के बाहर कही लगे वॉल्व को खोलते है और ट्रेन रोकते है। एक बार लड़के का अंदाजा गलत निकला तो ट्रैन सुदनीपुर और सलखापुर के बीच सई नदी पर बने लगभग ट्रैन के लंबाई के बराबर पुल पर ट्रेन रुक गयी जहा से न तो कोई उतर सकता था और ना ही चढ़ सकता था...
जाते समय यात्रा हमेशा सुखद और उछल कूद के साथ होती है लेकिन शाम में लौटते समय यह सुबह जैसी नही होती है। शाम में इनकी वापसी अधिकांशतः हिंसक हो जाती है क्योंकि कॉलेज में कौन किसको रोब दिखाया इन सब का हिसाब ट्रैन में ही होता है..
और एक दूसरे पर तर्क-वितर्क करते करते सब अपने-अपने मंजिल पहुंच जाते है और फिर कहते है भईया राम-राम...फिर मिलेगें...
Post By - Rahul Bind
Photo By- Saurabh Maurya
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